Tuesday, July 29, 2008

वाह ! :)

कुछ दम भरता हूँ, कुछ सासें भी तेज़ होती है,
आँखों पर कहाँ चलता है जोर, यह भी सुर्ख रोज़ होती है,
तुम याद आए तो ऐसा लगा,
कीसी रौशनी से हो सवेरा छठा,
ओस की बूंदों सी मासूमियत,
कीसी बचे की खिलखिलाहट से हो आसमा पता.


तुमहारे हुसन के चर्चे तो बहुत करते है,
उस मासूमियत का क्या करें जिससे हम बचते है,
कभी कैरी सी शरारत, कभी राब्ब की हरारत,
लॉन्ग सी मीठी भी, सर्दी की धुप सी फुर्सत,
उस नजाकत का क्या करें, जो कफीर बनने पे मजबूर करती है,
हमें हमारे अल्लाह से पल पल यह दूर करती है.

साकी से भी पुछा, नज़म उसे भी बे पर्दा की,
खुद डूब गया तेरी बातों में, तू ऐसे जो शर्मा दी,
जब ख्यालों से जग का यह आलम है,
तेरी मुस्कराहट से क्या होगा,
लगता है जालीम, यह पयार हर गली रुसवा होगा,
आशीको की फेहरिस्त को अभी तुम भुला दो,
यह इश्क, इंशाल्लाह, अभी और ज़वा होगा.

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